भगवान सूर्य की उपासना का पर्व है छठ। यह बिहार का एक महापर्व है और इसी के साथ झारखंड और उत्तर प्रदेश में भी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। लोकपर्व छठ के व्रत में सूर्य की पूजा की है और उनके साथ-साथ छठ मैया की पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि षष्ठी माता अपने संतानों की रक्षा करती हैं। इस पर्व का हिंदू धर्म में खास महत्व है।
छठी मैया के ऊंची रे अररीया, ओह पर चढलो न जाए;
लिहीना कवन देव कुदरीया,घटिया दाहिना बनाए!
ये लाइन हम यूं ही नहीं गा रहे हैं... हम मना रहे हैं छठी मैया का पर्व। जी हां, हम बात कर रहे एक ऐसे लोकप्रिय पर्व की जिसकी अखंड आस्था ही महिलाओं को यह करने की इच्छा शक्ति प्रदान करती है। इस पर्व का एक खास महत्व है।
चार दिन चलने वाले इस व्रत की शुरुआत होती है नहाए-खाए जो डूबते और उगते हुए सूरज को अर्घ्य देकर ही समाप्त की जाती है। छठ पर्व, छइठ या षष्ठी पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है। सूर्योपासना का यह अनुपम लोक पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। कहा जाता है यह पर्व मैथिल,मगध और भोजपुरी लोगों का सबसे बड़ा पर्व है और उनकी संस्कृति की पहचान है। यह पर्व सदियों पुराना है और वैदिक काल से चला आ रहा है।
ऐतिहासिक रूप से, यह सीताचरण मंदिर के लिए जाना जाता है जो मुंगेर में गंगा के बीच में एक शिलाखंड पर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि माता सीता ने मुंगेर में छठ पर्व मनाया था। इसके बाद ही छठ महापर्व की शुरुआत हुई। यही कारण भी है कि मुंगेर और बेगूसराय में छठ महापर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।
षष्ठी देवी की पूजा कैसे शुरू हुई
ऐसी मान्यता है कि प्रथम मनु स्वायम्भुव के पुत्र राजा प्रियव्रत की संतान नहीं थी और वह इसके चलते दुखी थे। तभी महर्षि कश्यप ने राजा से पुत्रेष्टि यज्ञ करने को कहा और यज्ञ करवाने के बाद उनकी महारानी ने पुत्र को जन्म दिया, लेकिन वह शिशु मरा हुआ पैदा हुआ। राजा का दुख देखकर एक दिव्य ज्योति के रूप में मां प्रकट हुईं और उन्होंने मृत बालक को जीवित कर दिया। उन्हें षष्ठी देवी की स्तुति की और तभी से इस पूजा का किया जाने लगा।
सूर्य की पूजा से मिलने वाले फल
भगवान सूर्य सभी पर उपकार करते हैं और अत्यंत दयालु हैं। सूर्य से सभी को चेतना प्राप्ति होती है और सूर्य की उपासना करने के पश्चात मनुष्य को तमाम कष्टों से मुक्ति मिलती है। चूंकि सूर्य को ब्रह्म का तेज बताया गया है और सूर्य धर्म, काम, मोक्ष और अर्थ जैसे चार पुरुषार्थों को देने वाले हैं।
लोक आस्था का पर्व है छठ
इस पर्व पर जो भी महिला व्रत रखती है वो पूरे भाव से पानी में खड़े होकर भगवान सूर्य तो अर्घ्य देती है। इस पर्वा में भगवान सूर्य और षष्ठी मैया की वंदना के बाद ही भोज आदि किए जाते हैं। दरअसल भगवान सूर्य की दो पत्नियां हैं ऊषा और प्रत्युषा। सूर्य सुबह की किरण ऊषा होती है और शाम की किरण प्रत्युषा। इसलिए जब हम सुबह और शाम सूर्य को अर्घ्य देते हैं तो सूर्य के साथ उनकी दोनों पत्नियों की भी अराधना की जाती है।
कृतज्ञता का पर्व है छठ
कहा जाता है कि यह पर्व ऊर्जा, ऊष्मा और लगाव का पर्व है। सूर्य को दिया जाने वाला अर्घ्य देने का मतलब यही है कि आप अपने अंदर की अग्नि को प्रज्वलित कर रहे हैं। हर व्यक्ति में सूर्य है, हर आदमी में चन्द्रमा है। हर मनुष्य में सारी ऋतुएं बसती हैं और ये हमारे अंदर के रंगों को दर्शाती हैं। लोक जीवन में सूर्य ही तो हमारा मित्र है और देवता भी। छठ में निकलने वाला सूर्य तो अत्यंत आकर्षक होता है, जैसा चमचाता शुद्ध सोना। यह पर्व है जो हमें अनुशासित जीवन की सीख देता है और हमें कृतज्ञ रहने के लिए हमेशा प्रेरित करता है।
मनोकामना का महापर्व
छठ पर्व के बारे में एक कथा है कि जब पांडव अपना सारा राजपाठ जुए में हार गए थे, तब द्रोपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को सब कुछ वापस मिल गया। लोक परंपरा के अनुसार, सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई।
पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है छठ
बिहार जैसे राज्य ने छठ के महत्व को भलिभाांति समझा है और यही कारण है कि व्रत रखने से पूर्व नदी घाटों और जलाशयों की सफाई की जाती है। इसके बाद जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है। सूर्य की छाया पानी में साफ-साफ दिखाई देनी चाहिए। तभी आपको उसका फल भी मिलता है। यह संदेश साफ है कि जल को इतना निर्मल और स्वच्छ होना चाहिए कि कि उसमें सूर्य की किरणें भी प्रतिबिंबित हो उठे।
छठ सूर्य की पराबैगनी किरणों को अवशोषित कर उसके हानिकारक प्रभावों से बचाती है। वैज्ञानिक भी यह मानते हैं कि कार्तिक मास की षष्ठी तिथि को धरती की सतह पर सूर्य की हानिकारक पराबैगनी किरणें मानक से अधिक मात्रा में टकराती हैं। लोग जल में खड़े होकर जब सूर्य को अर्घ्य देते हैं तो वे किरणें अवशोषित होकर आक्सीजन में परिणत हो जाती हैं, जिससे लोग उन किरणों के कुप्रभावों से बचते हैं। तभी तो प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा हो पाती है और हम चुस्त-दुरुस्त दिखते हैं।