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दीपावली: परंपरा एंव संस्कृति का महापर्व




दीपो का त्योहार, दीपावली भारत का सबसे बड़ा पर्व है। इसका हिंदू धर्म में बहुत महत्व है। यह अंधकार पर प्रकाश की जीत का प्रतीक है और इसलिए इस त्योहार पर लोग दीये और लाइट लगाकर इसका जश्न मनाते है। भगवान राम इस दिन अयोध्या वापस लौटे थे और तभी अयोध्या के लोगों ने दीपक जलाकर उनका स्वागत किया था। 

दीपों का पर्व, दीपावली हम भारतीयों के लिए बहुत मायने रखता है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता है। चारों ओर माहौल प्रकाशमय रहता है और दिवाली की वाइब्स में लोग पहले ही खो जाते हैं। महीने भर पहले से सारी तैयारियां शुरू हो जाती हैं। घर की साफ-सफाई और रोगन का सारा काम होने लगता है। दीपावली को कई मायनों में खास माना जाता है और यह एक ऐसा त्योहार है जो सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि भारत से बाहर भी खूब अच्छे से मनाया जाता है।

दीपावली की पौराणिक मान्याताएं

सबसे पहले दीपावली सतयुग में मनाई गई थी। देवता और दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया तो इस महा अभियान में कई सारे रत्न निकलें। उन्हें लेकर भगवान धनवंतरि प्रकट हुए तो उनके स्वागत में दीपक जलाए गए। इसके बाद त्रेतायुग में तब दीपावली बनाई गई जब भगवान राम रावण का वध करके अयोध्या वापस लौटे थे। द्वापर युग की दीपावली तब मनाई गई जब इंद्र पूजा का विरोध कर गोवर्धन पूजा का निर्णय लिया गया और इसी के चलते अन्नकूट की परंपरा शुरू हुई। वहीं कलियुग की दीपावली को स्वामी रामतीर्थ और स्वामी दयानंद के निर्वाण के साथ जोड़ा जाता है।

दीपावली का हमारे जीवन में है विशेष महत्व

14 वर्ष के वनवास के बाद जब राजा राम अयोध्या वापस लौटे, तब अपने राजा के वापसी की ख़ुशी में सभी प्रजाजन ने दीपक जलाकर उनका अपनी श्रद्धा भरी भावना से ऐसा भव्य स्वागत किया, जिससे उस दिन की काली रात्रि अर्थात अमावस प्रकाशित हो उठी। जब से ही यह पर्व पांच दिन तक मनाया जाता है, सभी दिनों के साथ कुछ धार्मिक कथाएं जुड़ी हुई हैं।

दीपावली वास्तव में एक मिलन का त्योहार है, जिसमे सभी अपनों से मिलते हैं, खुशियां बाटते हैं। आज की व्यस्त जिन्दगी में त्योहार का महत्व बढ़ गया है इसके कारण सभी अपनों के करीब आ पाते हैं। आज के वक्त में इसका महत्व सबसे ज्यादा वृद्ध व्यक्ति समझते हैं जिन्होंने परिवार को एक माला में पिरो रखने का सपना देखा था।

समाज में भाई चारे का संदेश लेकर आती है दीपावली

यह त्योहार लोगों को साथ लेकर आता है। एक-दूसरे के घर जाकर उन्हें दीपावली की बधाइयां देने का रिवाज है। दीपावली का प्रसाद जो खील और बताशे होते हैं, उन्हें भगवान को चढ़ाने के बाद अपने आस-पड़ोस के लोगों के बीच बांटा जाता है। इस तरह सारे गिले-शिकवों को दूर किया जाता है और भाईचारे की सद्भावना के साथ इस त्योहार को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

भारतीय परंपरा और संस्कृति से जुड़ने का पर्व

दिवाली के बहाने हम जुड़ते हैं दीये के साथ, जिसका भारती परंपरा से गहरा संबंध है। हालांकि आज दीयों का इस्तेमाल बहतु कम हो गया है। कुम्हार द्वारा बनाए गए मिट्टी के दीयों को जलाकर घर को रौशन करने का उत्साह ही अलग होता था। दीप तो हम भूल ही चुके हैं। दीप को भूलने का मतलब यह हुआ कि हमने माटी से अपना संबंध तोड़ लिया है। अपने देसी शिल्पकारों एवं हुनरमंदों को भी हम भूल गए हैं। बचपन में हम देखते थे कि बांस और लकड़ी की बनी कई तरह की डोलचियां, फूलडालियां बिका करती थीं, जिनमें फूल, फल आदि घरों में रखे जाते थे। दिवाली के अवसर पर ऐसी चीजें सड़क के किनारे फुटपाथ पर बिका करती थीं। दीपावली मन में उजास भरने का उत्सव है।

जीवन से अंधकार मिटाना सिखाती है दीपावली

हमारे जीवन में कठिनाइयां और मुश्किलें तो आती ही रहती हैं। जरूरी है कि हम इससे सीखकर आगे बढ़ें। दीपवाली का त्योहार हमें यही सीख भी देता है। इसका महत्व ही है रौशनी करना। जब आप हर जगह से खुद को मायूस पाते हैं तो अपने अंदर एक उम्मीद का दीया हमेशा जलाकर रखना चाहिए। अपने अंदर के अंधकार के लिए वो दीया जलाना बेहद जरूरी है। जब रावण ने सीता माता का अपहरण किया था तो श्री राम की जिंदगी भी अंधकारमय हो गई थी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और रावण को हराया। उन्होंने बुराई पर जीत हासिल की और अपने जीवन में रावण नाम के अंधकार को हटाकर सीता माता नाम का दीपक जलाकर रखा। इसी तरह हमें भी अपने अंदर से वो अंधकार मिटा देना चाहिए।

दुनिया के कई देशो में भी मनाया जाता है दीपावली का त्योहार

यह त्योहार सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के कई देशों में मनाया जाता है। हालांकि उनका तरीका कुछ अलग होता है। आइए जानते हैं भारत के अलावा वो कौन से देश हैं, जहां दीपावली मनाई जाती है। नेपाल में भी दिवाली मनाई जाती है। यहां दीपावली को 'तिहाड़' कहा जाता है। पांच दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में पहले दिन गाय की पूजा, दूसरे दिन कुत्तों की पूजा की जाती है। तीसरे दिन मिठाइयां बनती है और देवी-देवताओं की पूजा होती है। इसके बाद चौथे दिन लोग यमराज की पूजा करते हैं, जबकि पांचवें दिन भैया दूज मनाया जाता है। जापान में भी दीपावली बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। जापान में लोग अपने बगीचों में पेड़ों पर लालटेन और कागज से बने कंटील लटकाते हैं। इसके बाद उसे आसमान में छोड़ देते हैं। भारत की पूर्वी सीमा पर स्थित देश म्यांमार में भी लोग दीपावली बड़े धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन लोग यहां देवी-देवताओं की पूजा करते हैं और मिठाइयां और तमाम पकवान बनाते हैं। इंडोनेशिया में रामलीला खेलकर दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। खास बात ये है कि इस मौके पर यहां रामलीला का भी आयोजन किया जाता है, जो दुनियाभर में प्रसिद्ध है। मॉरीशस में रामायण का अपना अलग संस्करण है, जिसके अनुसार यहां के लोग दीपावली मनाते हैं। मॉरीशस के लोगों का मानना है कि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नर्कासुरन नामक असुर का वध किया था, इसलिए वो दीपावली का त्योहार मनाते हैं। सिंगापुर में भी दिवाली का त्योहार बहुत हर्षोल्लास से मनाया जाता है। यहां पर भारतीयों की संख्या ज्यादा है और इसलिए दिवाली पर यहां की सड़कें और बाजारों में अलग ही रौनक होती है। मलेशिया में लोग हरि दिवाली मनाते हैं। इस दौरान लोग पटाखे नहीं फोड़ते हैं, क्योंकि मलेशिया में पटाखे प्रतिबंधित हैं। दक्षिण भारतीय परंपरा के अनुसार, दीपावली के दिन लोग यहां सुबह उठ कर तेल और पानी से नहाते हैं। इसी तरह श्रीलंका और थाईलैंड में भी दिवाली का त्योहार मनाया जाता है। श्रीलंका के लोग अपने घरों को चीनी मिट्टी के दीयों से सजाते हैं और थाईलैंड में लोग केले के पत्तों के दीये बनाते हैं और उनमें सिक्के रखकर उस पर मोमबत्ती रखकर जलाते हैं। यहां दीपावली को 'लम क्रियओंघ' के नाम से जाना जाता है।