विजयदशमी आने वाले 5 अक्टूबर को धूमधाम से मनाया जाएगा। यह असत्य पर सत्य की विजय को दर्शाता है। सत्यमेव जयते की असली कहानी यह पर्व बड़ी खूबसूरती से बताता है। यह खुद के अंदर की नकारात्मकताओं पर विजय प्राप्त करने का पर्व है।
दशहरा का पर्व हर साल आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। यह दिवाली से 20 दिन पहले पड़ता है। यह अच्छाई की जीत है और बुराई की हार बताता है। इस दिन श्री राम ने लंका जाकर रावण का अभिमान चूर-चूर किया था। ऐसी भी मान्यता है कि मां दुर्गा ने इसी दिन लंबी लड़ाई के बाद महिषासुर का वध किया था। लंबे युद्ध के बाद देवलोक के वासियों को महिषासुर के प्रकोप से इस दिन मुक्ति मिली थी। यही कारण है कि इस पर्व को विजयदशमी भी कहा जाता है। इस दिन अलग-अलग स्थानों में रामलीला में जगह जगह रावण वध का प्रदर्शन होता है और क्षत्रियों के यहां शस्त्र की पूजा होती है। ब्रज के मंदिरों में इस दिन विशेष दर्शन होते हैं। इस दिन नीलकंठ का दर्शन बहुत ही शुभ माना जाता है।
हर साल लोग रावन दहन करते वक्त अपने अंदर के रावण को भी जलाने का प्रयास करते हैं और नकारात्मकता को दूर कर सकारात्मकता को गले लगाते हैं। दशहरे का महत्व और इसकी पौराणिक कथाएं, अपने आप में बेहद खास हैं।
दशहरे से जुड़ी पौराणिक कथाएं
मान्यतानुसार भगवान श्री राम और रावण के बीच 10 दिनों तक युद्ध् चलता रहा। इस युद्ध् के दौरान एक बार ऐसा हुआ कि रावण की शक्ति श्री राम को ज्यादा प्रभावशाली दिखाई दी। उस समय भगवान श्री राम ने शक्ति की पूजा की और इसके बाद से तमाम देवी और देवता उनके साथ युद्ध् में शामिल हुए। 10वें दिन में श्री राम ने रावण को हराया और उनका वध किया। जीत के इसी उत्सव को पूरे देश में दशहरा के रूप में मनाया जाता है और देश भर में रावण, उसके भाई कुंभकरण और पुत्र मेघनाद के पुतले को जलाया जाता है।
दशहरा 2022 तिथि और शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 5 अक्टूबर, बुधवार को है और इसलिए इस दिन दशहरा पर्व मनाया जाएगा।
अश्विन माह की दशमी तिथि आरंभ - 4 अक्टूबर, मंगलवार, दोपहर 02.21 बजे से
अश्विन माह की दशमी तिथि समापन- 5 अक्टूबर, बुधवार दोपहर 12 बजे तक
उदया तिथि के अनुसार दशहरा 5 अक्टूबर को मनाना ही शुभ होगा।
शक्ति का पर्व है दशहरा
यह बुराई, बुरे व्यवहार और असत्य पर अच्छाई की जीत को दर्शाता है। इसके प्रति सबकी मान्याताएं अलग-अलग है।अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन शस्त्र पूजन करने से आपको अपने दुश्मनों से मुक्ति मिलती है। यह विजय का पर्व है और भारतीय संस्कृति में इसी तरह की सच्चाई और वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव मनाया जाता है। यह मनुष्य के अंदर जन्में दस प्रकार के पापों- काम, ईर्ष्या, अहंकार, आलस्य, क्रोध, लोभ, मोह मद, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है।
साहस का महापर्व है
अन्याय पर न्याय की जीत तभी होती है, जब हम रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले को फूंक देते हैं और उसके बाद एक शांति बिसर जाती है, हमारे मन में। यह पर्व याद दिलाता है उस साहस की जो श्री राम में थी। यह पर्व याद दिलाता है उस साहस की जो माता सीता ने अपने अपहरण के दौरान अपनी मुट्ठी में रखा। यह पर्व याद दिलाता है उस साहस की, जब भगवान हनुमान ने इतने लोगों के सामने ने रावण का अहंकार जलाया। लंका में आग लगाई और अपना साहस दिखाया। दशहरे का पर्व हमारे अंदर उसी साहस को भरता है। आज हम जो अपने-अपने स्वार्थ और अंह के घेरे में घिर चुके हैं, यह पर्व उनके लिए एक आंखें खोलने का काम करता है। सत्य को समझने और अपनाने का साहस और संकल्प शायद हम सभी में चुकता जा रहा है। लेकिन विजयदशमी इसी साहस और संकल्प का महापर्व है। जीवन की इन दो महत्वपूर्ण शक्तियों को जाग्रत करने और उन्हें सही दिशा में नियोजित करने की महान प्रेरणाएं इसमें समाई हैं। इस पर्व के साथ जितनी भी पुराण कथाएं अथवा लोक परंपराएं जुड़ी हुई हैं, सबका सार यही है। इस पर्व से जुड़ी सबसे पुरातन कथा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की है।
ज्ञान अर्जन करने का पर्व
एक अज्ञान आदमी को इस दिन ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, एक स्वार्थी के लिए यह दान करने का दिन है, एक अभिमानी के लिए यह विनम्रता का दिन है, क्रोधी के लिए यह क्षमा करने का दिन है और आध्यात्मिक उत्थान की अभिलाषा रखने वाले के लिए यह दिन साधना माध्यम से स्वयं को भौतिक, भावनात्मक व आर्थिक असंतुलन से मुक्त कर प्रकृति व संतुलन की ओर अग्रसर करने का दिन है।